दंडकारण्य से लौटकर: अरुंधति राय

दख़ल दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केंद्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते... [पूरी पोस्ट]
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विकल्पहीन नहीं है दुनियाँ-

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[29 Mar 2010 00:40 AM]

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