गीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावॄत
घिस गई जो पिट गई जो बात वह गाता नहीं हूँगा चुके जिसको हजारों लोग, दोहराता नहीं हूँभाव हूँ मैं वह अनूठा, शब्द की उंगली पकड़ करचल दिया जो पंथ में तो लौट कर आता नहीं हूँ गीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावॄतकोई कॄत्रिम भाव मैने...
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राकेश खंडेलवाल
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[28 Mar 2010 21:46 PM]



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