बस वाहे बिकते नहीं हैं

गीतकार की कलम भेजते हैं ज़िन्दगी को पल निराशा के निमंत्रणऔर अस्वीकार करने को, पता लिखते नहीं हैं द्वार पर आते लिपट कर भोर की अँगड़ाईयों मेंमुस्कुराते हर दुपहरी धूप की परछाईयों मेंऔर जब सिन्दूर भरती मांग में संध्या लजाकरउस घड़ी सन्देश भरते गूँजती शहनाईयों में रात के पथ... [पूरी पोस्ट]
writer Geetkaar
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[28 Mar 2010 21:47 PM]

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