धर्म और चक्करदार जलेबी

एकोऽहम् यह निठल्ला चिन्तन है। एकदम रूटीन वाला। फुरसतिया चिन्तन। जब करने को कोई काम न हो तो फिर यही काम हो जाता है।हमारे जीवन में धर्म की भूमिका क्या है? वह हमें रास्ता दिखाता है या रास्ता रोकता है? बिना किसी बात के, गए कुछ दिनों से ये सवाल मेरी आँखों के आगे नाच... [पूरी पोस्ट]
writer विष्णु बैरागी

धर्म की दुकानदारी

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[28 Mar 2010 20:30 PM]

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