कला और युगबोध
आहत विश्व के प्रतिपल रुदन मेंखींची मुस्कान की रेखा सस्मित ।जग की व्यथा, निज के संतप्त मन मेंनव चेतना ले कला हुई अवतरित ।सृष्टि का चक्र जब से है चलायुग बदले और जग भी है बदला ।मनुज कई बार गिरा, गिरकर सम्भलागुफा से निकल अब अंतरिक्ष को निकला।उंचे आदर्शों के...
[पूरी पोस्ट]
अमरेन्द्र:
कविता
19
1
0
1
1
[28 Mar 2010 18:03 PM]



Shuffle








