खिड़कियाँ
खोल देता हूँ खिड़कियों कोबाहर धूप खिल रही हैचारों तरफ हरी मखमल-सी घासउन पर मोती जैसी ओस की बूँदेंचिड़ियों का कलरव शुरू हो गयाशरीर पर एक शाल डालबाहर चला आता हूँकुछ दूर तक टहलता हूँकितने दिनों बादइस सुबह को जी रहा हूँकितने एकाकी हो गये हैं हमबस अपने ही कामों...
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KK Yadava
कविता
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[01 Feb 2010 02:19 AM]



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