मौसमी दोहे

कवि बाबा कानपुरी सबसे उँचा स्वयम् को, वृक्ष समझता ताड़,इतराता लगता कभी, देखा नहीं पहाड़.मँहगाई को देख कर, हुआ टमाटर लाल,दस से बत्तिस हो गया, मारी एक उछाल.न्यायालय में देख ली, देर और अंधेर,मुक्त हुआ आरोप से,मोनिंदर पंधेर.नही समझ कुछ आ रहा, सोच रहे जसवंत,इस प्रकार होगा कभी,... [पूरी पोस्ट]
writer Baba Kanpuri
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[14 Feb 2010 08:10 AM]

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