काव्य की एक नई विधा जनक छ्न्द
जो स्वभाव से गाय हैं,शोषण उनका हो रहा,वहीं आज असहाय हैं.बाहर से खामोश हैं,झलक रहा तूफान सा,भीतर उसके रोष हैं.मिला जो कि वो कम नहीं,जो न मिला उसका हमें,किंचित कोई गम नहीं.मानव दानव एक हैं.नैतिकता का फ़र्क बस,लगते सभी अनेक हैं.रोम रोम में राम जोबसे, छावनी...
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Baba Kanpuri
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[13 Mar 2010 07:18 AM]



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