एक सपना जी रही हूँ

मानसी  एक सपना जी रही हूँपारदर्शी काँच पर सेटूटते बिखर रहे कण हँसता खिलखिला रहा हैआँख चुँधियाता हर इक क्षणथोड़े दिन का जानकर सुखमधु कलश सा पी रही हूँएक सपना जी रही हूँवह तुम्हारा स्पर्श अजाना जिसने छू लिया था मन को अनकही बातों ने फिर धीरेसे खोली थी गिरह... [पूरी पोस्ट]
writer मानसी
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[28 Mar 2010 00:53 AM]

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