भूखे-नंगे टूटे-खस्ते कितने खुश हैं
रेंग-रेंग कर चलते रस्ते कितने खुश हैं भूखे-नंगे टूटे-खस्ते कितने खुश हैं हमने इनका बचपन छीन लिया है इनसे बच्चों के कन्धों पर बस्ते कितने खुश हैं शाम हुई तो घर लौटेंगे इनमें कितने सुबह-सुबह कर रहे नमस्ते कितने खुश हैं अपने चेहरे की कालिख का किसे पता हैइक...
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ravindra sharma ravi
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[28 Mar 2010 00:36 AM]



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