स्वप्न
छविगृह से शारीरिक व मानसिक रूप से थका हरा मैं लौटा तो निराशा के कोहरे में आस्था का सूर्य डूब चूका था | प्रेरणा से परिपूर्ण असंख्य दृश्य जिन आँखों से देखे थे उन्ही से अंतिम दो तीन व्यंग्यात्मक दृश्य देखकर मेरे चिंतन में किंकर्तव्यविमूढ़ता का अँधेरा गहरा...
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क्षत्रिय
badalte drashy
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[27 Mar 2010 21:38 PM]



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