निशाँ उनके

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से.... वो चल दिए यूँ हम से हाथ छुड़ाकर, हम तकते रहे निशाँ उनके.सोचा कभी मिलजायेंगे राह में, हम ढूंढते रहे निशाँ उनके.रात की वीरानिओं में खो गये कहाँचाँद भी पहचान न पाया निशाँ उनके.नीर से गुजरी है वो कुछ इस कदरवहां भी न मिल पाए... [पूरी पोस्ट]
writer ●๋• नीर ஐ

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[27 Mar 2010 19:54 PM]

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