We all shit, we all pee but we never talk about it

बेदखल की डायरी अगर मैं ठीक-ठीक याद कर पा रही हूं तो ये पिछली गर्मियों की किसी तपती दोपहरी वाले दिन घटी घटना है। मैं घर में अकेली थी कुछ-कुछ फुरसतिया मूड में कभी इधर, कभी उधर बैठकर टाइम पास करती। तभी दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजे पर दो महिलाएं खड़ी थीं। मेरे दरवाजा खोलते... [पूरी पोस्ट]
writer मनीषा पांडे
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[27 Mar 2010 15:53 PM]

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