यकीन करना मुश्किल-हिन्दी व्यंग्य कविता

 हिन्द केसरी-पत्रिका खबरों से यकीन यूं उठ गया है क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं। कहीं चेहरे बदले तो कहीं चालें पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं। नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा पर खबरें बरसों तक चलती रहीं, कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा कहीं बेटियों के नाम भरती... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

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[27 Mar 2010 13:13 PM]

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