"ओस की बूँदें"
सूरज की आहट से, जाग के मदहोशी में,अलसाती ओस ने, फूल से सरगोशी में, बोला "दोस्त विदा, बस मुझको जाना है, मेरी इस काया को, भाप बन उड़ जाना है, अब मैं हवाओं के, पंखों पे झूलूँगी,उड़ते उड़ते, नभ शिखरों को छू लूंगी,बादल का कण बन, झूम झूम उड़ना है, पवन पवन देश...
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Yogesh Sharma
"ओस की बूँदें"
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[27 Mar 2010 10:49 AM]



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