“उपयोगी शिक्षाएँ” (अनुवादकः शास्त्री “मयंक”)
परोक्षे कार्यहन्तारं, प्रत्यक्षे प्रियवादिनम। वर्जयेत् तादृशं मित्रं, विषकुम्भं पयोमुखम्।। अनुवाद:- जो पीठ पीछे कार्य में बाधा डाले और सम्मुख आने पर मीठी-मीठी बातें करे। उस मित्र को त्याग देना चाहिए। वह उस घड़े के समान होता है जिसके भीतर विष फरा होता है...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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[27 Mar 2010 09:35 AM]



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