इच्छाओं की बन्द जेल में

Ajnabi जब भी चला तेरी याद का मौसम, भरी दोपहरी रात हुईमयखाने की गलियां जागीं, दुनियां के गम की बात हुईआंखों से खामोशी बोली, आहटों ने अचरजता घोलीइच्छाओं की बन्द जेल में, कई सलाखें डर के डोलींसपनों के रैन बसेरे छूटे, सूर्य किरनों में भ्रम सब छूटेदेह रसायनों के... [पूरी पोस्ट]
writer Rajey Sha

गजलनुमा

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[27 Mar 2010 08:13 AM]

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