अनकहे बोल
मेरे मानस में अनमने बोल हैंमन के क्षितिज पर अनकहे बोल हैंकहती हैं कहानियाँयह मेरे मन के चोर हैंअनबुझी सांस की पोर हैंजीवन के प्रवाह के छोर हैंफिरसासें क्यों नही आतीजब गुजरती है मेरी छायातुम्हारे कदमों से लिपट केढलती है मेरी कायातुम्हारे नयनों मे सिमट...
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रजनी भार्गव
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[27 Mar 2010 07:44 AM]



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