"घबरा के जो हम सर को ........ " : पहचानें ये आवाज़
कल दफ्तर से घर आते वक़्त ड्राइव करते करते ये ग़ज़ल सुन रहा था ...कोई दो चार लाइनें दिमाग में आईं ..बस यूं ही सी हैं ........ लेकिन यहाँ दर्ज कर रहा हूँ ......क़स्रत-ए-ग़म से चूर चूर रहाआप से इस क़दर मैं दूर रहागो मिलीं सारी ने'मतें मुझ कोआप के हिज्र में...
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अमिताभ मीत
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[27 Mar 2010 00:13 AM]



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