फरिश्तों की दरबार-हिन्दी शायरी

 दीपक भारतदीप की जागरण-पत्रिका फरिश्तों की दरबार में क्यों हाजिरी लगाने जाते हो, हो सकता है वहां रोज सुबह फर्श धोया जाता हो रंगीन रात के जश्न की धूल धोने के लिये तुम सफेद चेहरों की काली नीयत क्यों नहीं समझ पाते हो। पत्थर के बुतों की तरह खड़े हैं फरिश्ते वहां सांसें लेने के लिये नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

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[26 Mar 2010 12:53 PM]

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