सांय-सांय

अभिव्यक्तियाँ अंत समय में जैसे क्षितिज के अथाह विस्तार में उडने वाले पक्षी की बोली प्रती क्षण मद्धम होती जाती है यहा तक कि उसके शब्द का ध्यान मात्र शेष रह जाता है, इसी प्रकार हमारी बोली धीमी होते होते केवळ सांय सांय ही रह जाती है !!... [पूरी पोस्ट]
writer अनामिका की सदाये......
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[29 Nov 2009 08:26 AM]

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