कुंता

amitraghat अबजबकि छोड़ आया हूँ  मैंकुंता को बरघाट*और भूल चुका हूँउसका सादा-सा चेहरादो ही दिनों में,तब भी,क्यूँ कर रहा हूँ उस दिन का विश्लेषणअपने मित्र के साथ उससूने से पार्क मेंअपरिचित मुर्गाबियाँ देखते हुएशाम कोक्या इसलिये किपूछ रहा है वहउस रात की शुरूआत जब... [पूरी पोस्ट]
writer Amitraghat
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[26 Mar 2010 09:37 AM]

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