शंखनाद
अंतर द्वन्द कर बैठा मन पर चोट उस अन्तर नाद का शोर किसी ने नहीं सुना रख लिए हैं मैंने कानों पर दोनों हाथ लगा की घुल गया है सीसा जैसे पिघला हुआ .तन्हा हूँ मैं भरी महफ़िल में और भीड़ में भी हूँ अकेली छिटकी सी हुई कर लेती हूँ खुद को खुद में ही बंद सबकी नज़रों...
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sangeeta swarup
साहित्य
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[26 Mar 2010 09:52 AM]



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