उन उलझी बूंदॊं कॊ ....
थका हुआ कॊकिल का जॊड़ा...... आ छुपा है नैनॊं में नैनॊं का सिमटा सा साहिल .....सट के है सॊया पड़ा उन उलझी बूंदॊं कॊ ....पलकॊं से निथार रहा है कि कभी तॊ सुलझेंगी गाँठें मरणासन्न मन की गही हर धुँए कॊ दबा यहीं पार जाएगा हर पॊखर औ पल-पल यूं छाया पली .........
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swati
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[26 Mar 2010 06:38 AM]



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