मन हमारा पंछी....
(गुगुल से साभार) मन हमारा पंछी बन कर उड़ रहा आकाश में... ठौर यहाँ मिल ना सके, मिल जाएगी इतिहास में। सोचता है कौन, जीवन को समर, कोई यहाँ... चल रहे हैं हम सभी,भीड के ही साथ में। जी रहे हैं, या की जीना, आज हम को पड़ रहा... आज जीवन भी ये अपना, रहा नही है हाथ...
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परमजीत बाली
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[21 Mar 2010 20:42 PM]



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