कुछ नहीं हो सकता

चौथाखंभा.................. कुछ नहीं हो सकताइस मुर्दों के शहर मेंयहां पे बसते हैनिर्जीव आदमीचलता-फिरताहार-मांस का।1974 से किए गएप्रयासों के बादथक करकहतें हैं वेशायद ठीक भी कहतें हैंतो क्या हुआमैं भी इसी शहर का हूंऔर मैं मुर्दों में शामील नहीं होना चाहता.....Thanks... [पूरी पोस्ट]
writer अरूण साथी
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[26 Mar 2010 01:51 AM]

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