क्षणिकाएं

zakhm आज तो चाँदनी भी जल रही हैचाँद के आगोश को तड़प रही हैमोहब्बत केदंश झेल रही हैफिर भीउफ़ ना कर रही है  हर कश पर ख़त्म होती धुंआ बन उडती ज़िन्दगी गली के एक छोर पर खडीखामोश ज़िन्दगीफिर भीदूसरे छोर तक ना... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना
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[26 Mar 2010 01:38 AM]

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