दो रंग ...(कुछ यूँ ही )
अस्तित्व अपना ही अस्तित्व अजनबी सा नजर आता है मुझे ...जब गैरों को तू मुझे अपना कह कर मिलाता है.......आईनाअपना ही चेहराबिना आवाज़ केसामने तो दिख जाता हैपर ....आईने के पीछे की दुनियाक्या है.........यह कौन देख पाता है ?दिखते अक्स मेंधडकता दिल हैपीछे आईने की...
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रंजना [रंजू भाटिया]
छोटी कविताएँ.
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[26 Mar 2010 00:26 AM]



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