अपने जन्मदिन पर
एकन जाने कितने बीहड़ों को पार कर आया हूँ मैंजिसे बचपन में मास्टरजी कप-प्लेट धोने से ज़्यादा योग्य नहीं समझते थेकितने ही जन्मदिन आये-गयेख़याल ही नहीं रहाकुछ तो सिर्फ़ मजूरी करते हुए काटेआज भी याद नहीं रहताघर वाले ही याद दिलाते हैं अक़सरया कुछ सबसे अच्छे...
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प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi
कविता
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[26 Mar 2010 00:08 AM]



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