पोस्टमैन
तन पर कोट डटा है, सिर पर खाकी साफा बांधेचला आ रहा है लटकाए, झोला अपना कांधेकितने पत्र पिताओं के हैं, माताओं के कितनेउतने यहां खड़े बालकगण, बाट जोहते जितनेसबका नाम पुकार वस्तुएं, सबकी सबको देता हैबदले में न किसी से भी, एक दाम है लेता।हरिशचंद्र देव चातक...
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डाकिया बाबू
कविता
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[25 Mar 2010 22:30 PM]



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