मुझे माफ कर देना, नालायक बच्चा समझकर

खुली खिड़की पिछले कई दिनों से उलझन में था, करूं या न करूं। दिल कहता था करूं और दिमाग कहता था छोड़ यार। वैसी ही स्थिति बनी हुई थी, जैसे प्रेमी को पहला पत्र लिखने के वक्त बनती है, कई कागद काले कर दिए, फिर फाड़कर फेंक दिए, ऐसे ही कई नाम लिखे और मिटा दिए, लेकिन कल रात एक... [पूरी पोस्ट]
writer Kulwant Happy

युवा सोच युवा खयालात

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[25 Mar 2010 22:31 PM]

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