जो न देवियाँ हैं , न तितलियाँ
नाक-मुँह सिकोड़े टी.वी. पर ‘राखी का स्वयंवर’ देखते हुए बहुतों का जी यह सोचकर हलकान हुआ जाता था कि एक उद्दण्ड लड़की अपने सेलिब्रिटी होने के घमंड मे गंगा किनारे के छोरे को स्वयम्वर से बाहर का रास्ता दिखाती है और “बहू नही नौकरानी चाहिए” जैसी हमारे समाज की...
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सुजाता
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[25 Mar 2010 22:46 PM]



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