पानी का चेहरा
चिमनी में करती रही बातें हवा कल सारी रात जंगलों की कहानियाँ पहाड़ों की यातना समुंदरों का सीत्कार सो रही और कहीं जागती दुनिया के दुस्वप्न उसके अल्पविरामों के बीच झरती बरसों पहले बुझ चुके अंगारों की राख, चुपचाप नींद में भी सुनता रहा अपने आप को समेटता जूझता...
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मोहन राणा - Mohan Rana
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[25 Mar 2010 09:18 AM]



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