कपिलदेव त्रिपाठी की एक कविता
कविता की किताबकल की सुबह के बारे मेंकल वाले कल के पहले वाले कल ही सोच लिया जाना चाहिएयह सोचते हुए कल सोचा किकल कविता की वह किताब पढ़ूंगादफ़्तर जाने के पहले - किसी लावारिस वक़्त मेंदूबे जी से मिलनाक्या आज ही zaroori हैकल न भी मिलेंतो क्याइस तरह तो कविता...
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शिरीष कुमार मौर्य
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[25 Mar 2010 08:52 AM]



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