पिता के जूते

कस्बे का कवि... बचपन की बात और थीजब पिता के जूतों में पाँव डालकरनचते फिरते थे घर भर मेंदायें पैर का जूता बाएँ में औरबाएँ पैर का दाएँ मेंकितना चिल्लाती थी माँपिता की मार भी खाई कई बारजब एक जूता आँगन मेंऔर दूसरा बैठक में मिलाएक अजीब सा आकर्षण थापिता के जूतों मेंगिरना,... [पूरी पोस्ट]
writer मणिमोहन
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[25 Mar 2010 08:01 AM]

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