शादी बिनु राधा किशन

मनोरमा अक्सर हो पाता नहीं मन से मन का मेल।प्रायः अपने यूँ दिखे ज्यों पानी में तेल।।निन्दा में संलग्न हैं लोग कई दिन रात।दूजे का बस नाम है कहते अपनी बात।।चमके सोने की तरह अब आँगन में धूप।मजदूरों के तन जले पानी हुआ अनूप।।आगे पीछे गाड़ियाँ शासक की यह शान।आमलोग की... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[25 Mar 2010 06:17 AM]

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