कुछ उलझी कुछ सुलझी लट

Kuchh kahi kuchh unkahi कुछ उलझी कुछ सुलझी लट को आओ मैं सँवार दूँ,बाहों में भर लूँ तुमको और जी भर तुमको प्यार दूँ।मुझको नशा तेरी आँखों का है जिनमे डूबा रहता हूँ,सागर जैसी इन आँखों को आ मैं कजरे की धार दूँ।पतझड़ के मौसम में जब नग्न हो जाएँ सारे वृक्ष,तब मैं तुमको अपने हाथों से... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[25 Mar 2010 05:07 AM]

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