विरहिणी
प्राण न क्या तुम तक पहुँचेगी व्याकुल उर की करूण पुकार,और न क्या मैं फिर पाउंगीअपना लुटा हुआ संसार ?प्रात पवन ऊषा के आँचल से आती कुछ ले संदेश ,और कल्पना पगली चल पड़तीअपने प्रियतम के देश ! किन्तु भटक कर स्वयम्भावना में खो जाती है पगली ,और ह्रदय में छा जाती...
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Sadhana Vaid
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[24 Mar 2010 22:07 PM]



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