क्षिप्रा के तीर -1
चलूँ ! मालवा धरा निमंत्रण दे रही है | दो अँगुलियों से घूंघूट उठाकर देख रही है , मुझे आते हुए | उसके हरे भरे आँचल में आग की धड़कने सिमटी हुई है | ज्यों -ज्यों उज्जैन नगर समीप आ रहा है , त्यों त्यों रेलगाड़ी हांफती हुई जैसे पहुँचने के आतुर हो रही है और मैं...
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क्षत्रिय
स्व.श्री तन सिंह जी कलम से
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[24 Mar 2010 22:41 PM]



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