धीरे-धीरे चल....जिंदगी को जी......

साहित्य योग भाग रहा है इन्सान दौड़ रहा है अनचाहे सपनों के सड़क पर  कभी दायें तो कभी बायें मुड़ता फिर भी नहीं पहुँचता मंजिल पर सबको पीछे छोड़ने कि ठसक  सबसे आगे दिखने कि जिदमें क्यों है तैयार बिकने को खो गाया है तू कहीं इन्सान क्या हो गया है... [पूरी पोस्ट]
writer Tej Pratap Singh
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[24 Mar 2010 17:00 PM]

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