मैं कुछ नहीं !
चलते-चलते सांय-सांय सी ख़ामोशीऔर वक़्त के आईने में मैं !बहुत धुंधला नज़र आता है सबकुछ डर लगता है !जीत की ख़ुशी और अल्पना परप्रश्नों के रंग बिखरे होते हैं...आदत है सहज हो जाने कीवरना..कुछ भी तो सहज नहीं !हर कमरे में डर और शोर का अंदेशा..स्वाभाविक ज़िन्दगी...
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रश्मि प्रभा...
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[24 Mar 2010 13:09 PM]



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