यही दस्तूर है मकानों का

kabaadkhaana वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा।मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥कहीं  पढ थीं ये पंक्तियां ............याद रह गईं ॥... [पूरी पोस्ट]
writer अजय कुमार झा
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[24 Mar 2010 13:46 PM]

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