जानता हूँ पर .......
जानता हूं यह रास्ता कहीं नहीं जाता फिर भी चल रहा हूं ।जानता हूं आगे कुछ नहीं है फिर भी इसी पर ढल रहा हूं ।है अस्वीकार का साहस ।प्रतिरोध की शक्ति है ।जानता हूं हासिल हर जोड़ का शून्य है फिर भी स्वयं को कर एक विलम्बित मौन-सा इस ही राह पर बिछ रहा...
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Aarjav
कविता
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[24 Mar 2010 09:19 AM]



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