विरह के रंग की सीमा ...
गुफ्तगू उनसे रोज होती हैमुद्दतों सामना नहीं होता.... बशीर बद्र का यह शे'र वाकई यहाँ फिट बैठता है , ऐसा लगता है के ये कल ही की तो बात है जब सीमा जी ने ब्लॉग पर अपनी कविताओं से लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया था ... और ये एक आज का दिन जब उनकी पहली पुस्तक...
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"अर्श"
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[24 Mar 2010 05:07 AM]



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