दो-चार दोहे....

योगेंद्र मौदगिल सम्बन्धों की इस कदर टुकड़े-टुकड़े डोरपिता खड़ा इस ऒर तो पुत्र खड़ा उस ऒरपिता-पुत्र में ठन गयी निकल पड़ी तलवारबूढ़ा बरगद रो पड़ा देख समय की धारहाथ-पांव ढीले पड़े मुरझा गया शरीरबेटे बोले बाप से खिंचवा ले तस्वीरघोड़ी चढ़ने तक रहा मैं अम्मां की आसपांव बहू के... [पूरी पोस्ट]
writer योगेन्द्र मौदगिल
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[23 Mar 2010 23:24 PM]

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