हिना की रंगत हथेलियों पे
तुम्हारे अधरों की सिहरनों ने लकीर हाथों की जब से छू लतभी से रंगत हिना की गहरी हुई है मेरी हथेलियों पेनयन के दर्पण में आ के संवरीं हजार झीलें उषा की झिलमिकपोल पर आ लगीं थिरकने सिन्दूर घोले हुए विभायेंअधर कीथिरकन में थरथरा कर अटकती वाणी लगी है खोनेलगीं...
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राकेश खंडेलवाल
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[23 Mar 2010 21:58 PM]



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