रोशनी है इतनी कि आँख नहीं लगती है

उधेड़-बुन सारा दिन गुज़र जाता हैऔर प्यास नहीं लगती हैदेख के दुश्मन भीतन में आग नहीं लगती हैऐसा भी नहीं किमैं एक रोबोट हूँ यारोकम्बख़्त रोशनी है इतनीकि आँख नहीं लगती हैजीने के तो वैसेकई तरीके हैं लेकिनअपनी ही तबियतकुछ खास नहीं लगती हैआएगा वो दिनजब वो ढूंढेगी... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[23 Mar 2010 20:32 PM]

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