धुलियाये लैंडस्केप में..
जाने कैसी आवारा गोधुलि बेला है, खुले उजाड़ मैदान के एक छोर टहलते हुए लगता है मानो ग़लत पते पर आ गए हों. जैसे मैदानी नाटकीय फैलाव के किसी कोने रेज़्ड प्लेटफ़ॉर्म पर कोई तेलुगू बाई का राजस्थानी नाच हो सकता था, या प्रतापगढ़ की किसी बिसराई नौटंकी का रिपीट...
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Pramod Singh
जुसेप्पे से जिरह
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[23 Mar 2010 14:46 PM]



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