निशानी
रात की गहराई में जाने कहाँरोज़ फिरता हूँ दर-बदर,छीनली हैं नींद मेरी जहानने आँखों से इस कदर.ख्वाबों को आँखों में संजोय,सहेज के रखा है कब से.सरहद पलकों की पार न करदे,बहलाया है उनको शब से.सजदा मेरा ये आखरी है तुझसे, आतिश ने मेरे ख्वाब जलाए हैं.अगर आओ कभी...
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●๋• नीर ஐ
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[23 Mar 2010 13:48 PM]



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