मिलन
आग को बाहों में थामे दूरआकाश में उड़ रही थी रुई,मुसाफिरों का कौतूहलउड़ा रहा था धुल का गुबार,गुन-गुनाते उड़े आ रहे थे आशियानेमें अपने वापिस मुसाफिर.तो कहीं डाली पे बैठ करफिजा खिल-खिला रही थी,चलो चलें हम भी कुछगीत गा लें, मुस्कुरा लें.दिन का रात से मिलनेका...
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●๋• नीर ஐ
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[23 Mar 2010 14:02 PM]



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